मैं हवा पानी परिंदा कुछ नहीं...

मैं हवा पानी परिंदा कुछ नहीं...

दोपहर कबूतर के पंख की तरह थी. सुरमई, मुलायम और बहुत हल्की. इतनी हल्की कि किसी का भी मन उड़ने को कर सकता था. अली अपनी लिखने की मेज के सामने बैठा कुछ सोच रहा था तभी उसके बदन में अजीब-सी कंपकंपी हुई और देखते ही देखते वो एक चिड़िया में बदल गया. पहले वो चकराया. गर्दन घुमा-घुमा कर अपने को देखा. अपनी कुर्सी से वो थोड़ा-सा उड़ा और फुदककर मेज पर रखी एक मोटी-सी किताब पर जा बैठा. गर्दन झुकाकर उसने किताब को देखा. यह उसकी आत्मकथा थी जो अभी कुछ दिन पहले ही छपकर आई थी. किताब से उड़कर वो आईने के सामने गया और बहुत देर तक अपने को देखता रहा. उसने महसूस किया कि अचानक ही उसकी आंखें और कान बहुत तेज हो गए हैं. वो पूरी तौर पर एक चिड़िया बन चुका था. वो इस कमरे में नहीं रह सकता था. उसे बाहर जाना ही था जहां गुलेलें थीं. जाल थे. तीर-कमान थे और बंदूकें थीं. उसे याद आया कि पक्षी विज्ञानी बनने से पहले उसने कई चिड़ों को एक ही दिन में पत्थर से मार गिराया था. इस घटना की याद आते ही अली के बदन में एक फुरफुरी-सी हुई. वो उड़कर खिड़की के पल्ले पर बैठा, आसपास नजर दौड़ाई और फिर उड़ान भर दी.

अली का चिड़िया में बदलना जितना अचानक लगता था, उतना अचानक था नहीं. सरीसृपों की बिरादरी से चिड़िया के जन्म की दास्तान तो लोगबाग जानते थे, पर मनुष्य के चिड़िया बन जाने की यह पहली घटना थी. पिछले काफी दिनों से अली का बदन सिकुड़ता जा रहा था. दिनों-दिन उसका वजन कम हो रहा था. अभी कुछ दिन पहले ही सईद आया था. सईद अली के बचपन का दोस्त था. सईद ने कहा था कि अली तुम्हारा चेहरा दिनोंदिन चिड़ियों की तरह छोटा और चोंचदार होता जा रहा है. अली ने उसे मजाक की तरह लिया और यह कहकर कि सोहबत का असर तो होता ही है, ठहाका लगाया था. अली को आज लग रहा था कि सईद ने शायद पहले ही इस बदलाव को ताड़ लिया था. अली ने एक लंबी-सी उड़ान भरी. उसे बस एक ही बात की तसल्ली थी कि वो चिड़ियों की तरह भी बोल सकता था और मनुष्यों की तरह भी. बदलते-बदलते भी उसका दिमाग और बोलने की कूवत बची रह गई थी. 

लंबी उड़ान के बाद अली का मन हल्का हो गया था. सुस्ताने को वो एक पेड़ की डाल पर जा बैठा. उस समय उस पेड़ पर कोई चिड़िया नहीं थी. उसने राहत की सांस ली. इसी समय उसने बीट की और उसे अचानक ध्यान आया कि वो एकदम नंगा है. पहले वो झेंपा, फिर उसे ख़याल आया कि अब वो मनुष्य नहीं, एक चिड़िया है, और कोई चिड़िया कभी कपड़े नहीं पहनती. चिड़िया तो कपास के पेड़ पर भी नहीं जाती. वो मन-ही-मन मुस्कुराया. पहले जब वो मुस्कुराता था तो उसके छोटे से चेहरे की झुर्रियां हल्के से कांपती थीं. अब यह संभव नहीं था. एक ही दिक्कत थी कि उसके हाथ पंखों में बदल गए थे. उनमें कलम नहीं पकड़ी जा सकती थी. किताब के पन्ने नहीं पलटे जा सकते थे. और सिगरेट...सिगरेट का खयाल आते ही उसे लगा कि चिड़िया बनने के बाद से उसे एक बार भी सिगरेट की तलब नहीं लगी थी. वो सोच रहा था कि जब जंगल की चिड़ियों से वो हिल-मिल जाएगा तो उनसे उन्हीं की बोली में बातें कर सकेगा. वो जानना चाहता था कि अध्ययन के दौरान वो जिन निष्कर्षों पर पहुंचा था, वे कितने सही और कितने गलत थे. उसने सोचा कि नई जानकारियों के आधार पर वो अपनी तमाम किताबों को ठीक-ठाक करेगा. वो जितना सोच रहा था और परेशान हो रहा था.

अली चिड़िया तो बन गया था लेकिन वह दिखने में और चिड़ियों से थोड़ा अलग था. धरती पर पाई जाने वाली चिड़ियों की आठ-साढ़े आठ हजार जातियों की बनक से उसकी बनक अलग थी. शाम हो रही थी. दूसरी चिड़ियां वापस लौट रही थीं. चिड़ियां एक नजर अली को देखतीं और कतराकर निकल जातीं. उनकी आंखों में आश्चर्य भी था और संशय भी. उन्होंने आपस में कहा-लगता है कहीं दूर देश से उड़कर आई है. लगता है भटक गई है. अली यह सुन मन-ही-मन मुस्कुराया. एक बार सोचा कि इन्हें बता दूं. पर डर था. उसकी बात पर कौन भरोसा करता. उसने सोचा, इंसानों की बिरादरी से तो पहले ही बाहर हो गया हूं, अब हकीकत बताने जाऊं तो कहीं पंछियों की बिरादरी से भी बाहर न कर दिया जाऊं. वो चुप लगा गया. इसी समय पास की डाल पर एक फुलचुक्की दिखी. यह टिकेल फुलचुक्की है, उसने मन-ही-मन में कहा. यह चिड़िया उसे बहुत पसंद थी. सुंदर रंगबिरंगी चिड़ियों में उसे शकरखोरा भी बहुत पसंद था. फुलचुक्की पहले तो थोड़ी घबराई, लेकिन फिर वो अली से बतियाने लगी. अध्ययन के दौरान अली ने जो कुछ इस चिड़िया के बारे में जाना था, वही सब उसने कह सुनाया. अंगूठे के बराबर वह छोटी-सी चिड़िया थोड़ी देर तो आंखें मटकाकर सुनती रही, फिर अचानक जोर-जोर से हंसने लगी. इसमें हंसने की क्या बात है? अली ने उससे पूछा. पर वह तो हंसती रही. जब हंसी थमी तो उसने अली को अपने बारे में बहुत सारी ऐसी बातें बताईं, जो अली नहीं जानता था. अली चकरा गया. इत्ती-सी चिड़िया का इतना बड़ा जंजाल. उसे तमाम किताबें अधूरी लग रही थीं. काश! उसने मन-ही-मन कहा और एक लंबी सांस लेकर चुप हो गया.

अली एक बार लिखने-पढ़ने वाले कमरे में जाना चाहता था. कई दिन हो चुके थे, वह वहां नहीं गया था. उसे घर की याद आ रही थी. गनीमत थी कि कमरे की खिड़की खुली हुई थी. खिड़की से वो कमरे में आया. कमरा उसकी अनुपस्थिति में साफ-सूफ कर दिया गया था. किताबें करीने से रैक में सजी थीं. बचपन से चिड़िया बनने तक कभी उसका कमरा साफ-सुथरा नहीं रह पाया. बचपन में इस बात को लेकर वो अक्सर मां की डांट खाता और शादी के बाद बीवी के ताने सुनता. कमरा इधर साफ किया जाता और उधर उसका बिखरना शुरू हो जाता. देखते ही देखते एक के बाद एक किताबें निकलती जातीं. अखबारी कतरनों, कागजों और घूम-घूमकर खींचे अलग-अलग पक्षियों के फोटोग्राफ्स का ढेर लगता जाता. पहले टेबिल भर जाती. फिर बिस्तर और अंत में जमीन पर ढेर लगने लगते. इस चक्कर में कई-कई दिनों तक कमरे में झाडू भी नहीं लग पाती.

पक्षियों का पीछा करने का शौक अली को बचपन से ही लग गया था. बचपन में सबको लगता कि अभी छोटा है. बचपन में हर किसी को परिंदे अच्छे लगते हैं. सच पूछो तो बचपन में हर उड़ने वाली चीज अच्छी लगती है. चिड़िया हो, पतंग हो, गैस के गुब्बारे हों या हवाई जहाज. अली के अब्बू और अम्मी को भी लगता कि लड़का जब बड़ा होगा तो सब ठीक हो जाएगा. पर ऐसा हुआ नहीं. अली जैसे-जैसे बड़ा होता गया उसका जुनून भी बढ़ता गया. घरवालों को रात-दिन यही फिकर लगी रहती कि पता नहीं इस लड़के का क्या होगा. मारा-पीटा, समझाया-बुझाया. डाक्टर की सलाह पर मनोचिकित्सकों को भी दिखा दिया. पर कोई फायदा नहीं हुआ. स्कूल के बच्चे भी उसे सनकी समझते. कई बार ऐसा होता कि मैदान में बच्चों के साथ खेलते-खेलते अचानक अली को कोई चिड़िया दिख जाती और वो बच्चों और खेल को छोड़कर चिड़िया का पीछा करता दूर निकल जाता. यह पागलपन धीरे-धीरे सारी हदें पार कर गया. स्कूल से घर को निकला अली जंगलों की तरफ चला जाता और कई-कई दिनों तक उसका पता नहीं चलता. जेब में पैसे भी नहीं होते. भूखा-प्यासा न जाने कहां-कहां भटकता रहता.

अली उन दिनों चिड़ियों के बारे में ही सोचता. उन्हीं के बारे में पढ़ता. उन्हीं का पीछा करता और जब तब उन्हीं के बारे में नोट्स लेता रहता. उसके नोट्स से कई मोटी-मोटी कापियां भर गई थीं. सईद उसका अकेला दोस्त था. सईद के पिता वहीद मियां को भी परिंदों के बारे में पढ़ने का शौक था. वहीद मियां ने बताया था कि स्कूल के दिनों में उन्होंने ऑर्निथोलाॅजिस्ट बनने का सपना देखा था, लेकिन उनके घर वालों ने उड़ान से पहले ही उनके पर कतर दिए थे. 

सीने में एक अधूरी इच्छा दबी रह गई थी जो अब परिंदों के बारे में नई किताबें पढ़ने तक महदूद हो गई थीं. अली में उन्हें अपनी अधूरी इच्छा पूरी होती दिखती थी. इसलिए वहीद मियां अली के लिए नई से नई और पुरानी से पुरानी किताबें इकट्ठी करने लगे थे. शुरुआती दिनों में उन्होंने अली को थाॅमसन की ‘बायलाॅजी ऑफ़ बर्ड्स’ पढ़ने को दी थी. यह एक दुर्लभ किताब थी. इस किताब ने अली पर जादू-सा असर किया था. इसके बाद तो अली ने वहीद मियां की लाइब्रेरी में रखे सलीम अली और एस. डिल्लन रिप्ले की ‘हैंडबुक ऑफ़ द बर्ड्स ऑफ़ इंडिया एंड पाकिस्तान’ के दसों खंड चाट डाले थे. इन दोनों मुल्कों के आदमियों के बारे में भी कोई इतना नहीं जानता होगा जितना अली वहां के परिंदों के बारे में जानता था. गनीमत थी कि परिंदों में कोई सियासी झगड़ा नहीं था. सईद को परिंदों के बारे में जानने का कोई शौक नहीं था. लेकिन अली जब किसी खास परिंदे के बारे में बताने लगता तो सईद बहुत गौर से सुनता. उसका कहना था कि अली जब परिंदों के बारे में बोलता है तो वो खुद भी एक परिंदे जैसा ही लगने लगता है-भोला और खूबसूरत.

अली अभी टेबिल पर बैठा पुरानी यादों में खोया हुआ था तभी उसकी बीवी अंदर दाखिल हुई. उसने अपने खाविंद की किताब पर चिड़िया को बैठे देखा तो हुश-हुश करके उसे उड़ाने लगी. अली कुछ देर इधर-उधर उड़-उड़ कर बीवी को छकाता रहा. फिर उसने बदन को झटकारा और कुछ छोटे पंख यहां-वहां गिरा दिए. बीवी झुंझलाकर बड़बड़ाने लगी. कितनी बार मियां से कहा है कि इस खिड़की में जाली लगवा दो. यहां से गौरैया अंदर आ जाती हैं, पंखे के ऊपर घोंसला बना लेती हैं. सारे कमरे में कचरा करती हैं. पर मियां को तो लगता है ये ही उनकी असल रिश्तेदार हैं. उनका बस चले तो इन मुंहजलियों के लिए अपनी बीवी को तलाक दे दें. बीवी बड़बड़ा रही थी और अली अलमारी के ऊपर बैठे मजे ले रहा था. बीवी ने झाडू़ उठाई और अली के पीछे लपकी. अली उड़कर खिड़की से बाहर निकल गया. अली मन-ही-मन मुस्कुरा रहा था. चाहता तो अपनी आवाज में बोलकर बीवी को चैंका सकता था. पर उसे लगा फिजूल में अभी रोना-धोना मच जाएगा. लोगों को लगता है आदमी या तो धरती पर रहे या सीधा जन्नत में चला जाए. जमीन और जन्नत के बीच किसी तीसरी जगह का कोई तसव्वुर लोगों के पास नहीं था. जहन्नुम अगर कहीं था तो वो या तो जमीन पर ही था या जन्नत के बगल वाले फ्लैट में था. अली चुपचाप निकल गया. 

खिड़की बंद करके अभी अली की बीवी पलटी ही थी कि उसे लगा उसका मन उसी चिड़िया में अटका रह गया है. वो चिड़िया का चेहरा याद करने की कोशिश करने लगी. थककर अपने पलंग पर जाकर लेट गई. अचानक उसे लगा कि उस चिड़िया का चेहरा अली से मिलता था लेकिन यह खयाल आते ही वो उठ बैठी. उसने इस खयाल को झटक देने की कोशिश की. उसे लगा कि उसका दिमाग खराब हो गया है. वो जितना इस खयाल को दिमाग से हटाने की कोशिश करती उतना ही ज्यादा उसमें उलझती जाती. उसे याद आया कि अली की नाक के पास जिस जगह मस्सा है उसी जगह चिड़ियों की चोंच के पास भी मस्से के बराबर काला निशान था. बात ऐसी थी कि किसी को बताना भी मुश्किल था. लोग सुनते ही तय था कि मजाक बनाते. शाम को सईद को उसने इस तरह सुनाया जैसे कोई चुटकला सुना रही हो. सईद भी उसी तरह हंसा जैसे कोई मजेदार-सा चुटकला सुना हो. बेमन से उसने भी हंसी में साथ दिया. वो जानती थी यही होना था. उसने तय किया, अब यह बात वो किसी से भी नहीं कहेगी. सईद के जाते ही वो उठी और अली के कमरे की उस खिड़की को वापस खोल आई, जिसे उसने बंद कर दिया था.

अली कई दिन से गायब था. उसका इस तरह गायब हो जाना न घर वालों के लिए कोई खास बात थी, न दोस्तों के लिए. धीरे-धीरे समय का फासला बढ़ रहा था और चिंता ने अपने हाथ-पांव निकालना शुरू कर दिया था. दोस्तों को लेकिन यकीन था कि अली एक-न-एक दिन कोई दूर की कौड़ी लाएगा. अली ने कई दुर्लभ चिड़ियों की फेहरिस्त बना रखी थी. दोस्तों के बीच भी वह कई बार उन चिड़ियों का जिक्र कर चुका था. इन चिड़ियों में पहाड़ी बटेर सचमुच एक ऐसी चिड़िया थी जो किसी अंधे के हाथ भी नहीं लगी थी. 1876 के बाद उसे किसी ने नहीं देखा था. लगता था जैसे अंग्रेज बहादुरों ने हमारे कोहिनूर की तरह पहाड़ी बटेर को भी चुरा लिया था. अली ऐसी ही किसी दुर्लभ चिड़िया को ढूंढ़ निकालने का सपना देखता रहता. धीरे-धीरे उसके लेख छपने लगे थे और उसे पक्षी विज्ञानी माना जाने लगा था. दोस्त अब उसका मजाक उड़ाते तो उस मजाक में सम्मान जैसा भी कुछ झाई मारता.

अली जल्दी से जल्दी वापस जंगल पहुंचना चाहता था. उसने फिलहाल इस खयाल को मुल्तवी कर दिया कि परिंदों से मिलने वाली जानकारी किसी दोस्त को बताकर लिखवा दी जाए. चिड़िया बन जाने के इस राज को वो राज ही रखना चाहता था. उसने सोचा जब अपनी शरीक-ए-हयात को ही नहीं बताया तो किसी और नामुराद की क्या औकात. यही सब सोचता हुआ वो उड़ रहा था. तभी उसकी नजर बालकिशन के मकान पर पड़ी. बालकिशन बरामदे में बैठा चाय पी रहा था. अली और बालकिशन कभी स्कूल में एक साथ पढ़ते थे. अली बालकिशन को पसंद नहीं करता था. बालकिशन हल्की तबीयत का आदमी था और अपने फायदे के लिए किसी भी हद तक जा सकता था. अली यूं ही बेमतलब बालकिशन के बरामदे में उतर आया. वो बरामदे की छत से टंगे एक गमले पर जा बैठा. बालकिशन के सामने सुबह के अखबार का शेयर बाजार वाला पन्ना खुला हुआ था. अली ने मन-ही-मन गाली दी. साले को शेयर बाजार के सिवा कुछ नहीं दिखता. कभी बाजार में निकलकर देख कि तेरी औकात के शेयर का भाव कितना नीचे गिर चुका है, इसी समय एक ऐसी घटना या कहें दुर्घटना हुई जिसने अली के लिए सब कुछ उलट-पुलट कर डाला.

बालकिशन चाय पीते हुए शेयर बाजार वाला पन्ना पढ़ रहा था. इसी समय बालकिशन की बहन हाथ में एक पिंजरा लिए बाहर आई. इस पिंजरे में एक पहाड़ी मैना थी. यह लड़की मन-ही-मन अली से प्रेम करती थी. अली को पहचानने में देर नहीं लगी कि यह वही मैना थी जो पिछले दिनों उसे जंगल में मिली थी. अली पौधे के पीछे छिपने की कोशिश कर रहा था. यह मैना पहले कभी किसी घर में रह चुकी थी. इसलिए वो कुछ रटे हुए वाक्य बोल लेती थी. जंगल में इसी बात से अली गच्चा खा गया था. मैना एक दिन जब उसके पास से गुजरी तो उसने मनुष्यों से सीखा कोई वाक्य बोला. अली के मुंह से अचानक ही वाह निकल गया. परदेस में जैसे कोई हमजुबां मिल गया हो. बस वाह निकलना था कि मैना अली के पीछे पड़ गई. अली को थक-हार कर अपने बारे में बताना ही पड़ा. अली ने सोचा भी नहीं था कि उसका यह अंजाम होगा. किसी चिड़िया पकड़ने वाले ने शायद उस मैना को पकड़कर बालकिशन के हाथ बेच दिया था. अचानक ही मैना ने पौधे के पीछे छिपे अली को देख लिया. वो अली...अली...कहकर जोर-जोर से चिल्लाने लगी. बालकिशन की बहन समझी कि मैना उसे चिढ़ा रही है. वो मैना को वहीं बरामदे में छोड़कर अंदर भाग गई.

बालकिशन का दिमाग एक साथ ढाई घर चलता था. उसके बारे में कहा जाता था कि उसकी आंख में सूअर का बाल है और वो, उड़ती चिड़िया के पंख गिन लेता है. उसने एक बार मैना को देखा और दूसरे ही पल लपककर अली को धर दबोचा. अली के पास कोई चारा नहीं था. उसे अपने चिड़िया में बदल जाने के बारे में बताना ही पड़ा. बालकिशन के हाथ तो जैसे लाॅटरी ही लग गई थी. इसी खुशी में उससे एक गलती हो गई, उसने अली को हाथ की पकड़ से मुक्त कर दिया. मौका मिलते ही अली उड़न छू हो गया. बालकिशन चिल्लाता रहा, पर अली ने मुड़कर नहीं देखा.

अली तो उड़ गया. बालकिशन लेकिन एक चलता-फिरता अखबार था. खबर फैलते ज्यादा देर नहीं लगी. बालकिशन के बारे में कहा जाता था कि उसका सर्कुलेशन किसी राष्ट्रीय अखबार से भी ज्यादा है. इसी बात का फायदा उठाकर वो कई बार तरह-तरह की अफवाहें भी उड़ाया करता था. उस पर ज्यादा लोग भरोसा नहीं करते थे. कई दोस्त उसे गप्पी किशन भी कहने लगे थे. इस बार लेकिन तुरत-फुरत उसने एक लेख लिखा और उसे छपा दिया. लेख इतना रोचक और सनसनीखेज था कि पूरा शहर इस पर बात कर रहा था. शहर में दो ग्रुप बन गए थे. एक मानता था कि यह कोरी गप्प है, लेकिन दूसरा ग्रुप बालकिशन की बातों पर यकीन कर रहा था. अली की बीवी को लगा कि उसका शक सही निकला. उसे बालकिशन की बात एकदम सही लग रही थी. और वो बेचैन थी और उदास भी.

सरकार के कान पर जूं जितनी तसल्ली से रेंगती थी, उतनी ही तसल्ली से उसने रेंगना शुरू किया. सरकार ने पहले गुपचुप ढंग से सच्चाई जानने की कोशिश की. उसकी गुप्तचर एजेंसियां कुछ-कुछ खबर दे रही थीं लेकिन कोई ठोस सबूत हाथ नहीं आ रहा था. बालकिशन के लेख ने लेकिन कई सरकारी महकमों में हड़कंप मचा दिया था. उसने अली नाम की चिड़िया का जो हुलिया बयान किया था, उसमें बारीकी नहीं थी. उस विवरण से उस चिड़िया को पहचानना मुश्किल था. जिस बात ने सबसे ज्यादा हड़कंप मचाया वो यह थी कि अली नाम की चिड़िया आदमी की जबान में भी बोल लेती है और वो भी कोई रटे-रटाए वाक्य नहीं, खुद के सोचे-समझे वाक्य. जंगल महकमे में सबसे ज्यादा हवाइयां उड़ी हुई थीं. शक हालांकि अभी भी बना हुआ था. शक चीज ही ऐसी थी जो जरा-सी संध मिलते ही घास की तरह उग आती थी. उसके लिए किसी को बीज डालने की जरूरत नहीं पड़ती थी. लगता था जैसे हवा हमेशा ही अपनी जेब में शक के बीज लिए घूमती हो. इस शक पर लेकिन यकीन का पलड़ा भारी था.

यकीन की शक्ल भी लेकिन यकीन की तरह नहीं शक की तरह थी. जो बार-बार कान में फुसफुसाता था कि मान लो कि सचमुच ऐसा हो गया हो, अली सचमुच एक चिड़िया में बदल गया हो, तब...तब क्या होगा? नहीं होने के शक पर होने का शक भारी था. जिससे ज्यादा नुकसान हो सकता हो वह शक हमेशा भारी होता है. जंगल में अवैध कटाई और शिकार से जुड़े कई शक्तिशाली गिरोह थे. जंगल जैसे एक दिमाग था और देश के पूरे शरीर में उसकी नसों का जाल फैला था. कहीं कोई नस दबाओ जंगल महकमे की नींद में खलल पड़ता था. जंगल माफिया का संबंध जंगल विभाग के हर छोटे बड़े कर्मचारी से था. जो इस सामूहिक कीर्तन में शामिल होने से ना-नुकर करता, मार दिया जाता. कई नौजवान रेंजर और सुरक्षा कर्मचारी आए दिन मार दिए जाते थे. इस निरंतर चलते हत्याकांड में कुछ अपनी ईमानदारी के कारण मारे जाते और कुछ अपनी चादर से बाहर पांव फैलाने के लिए. मर जाने के बाद सभी को लेकिन ईमानदार ही माना जाता था. मर गए आदमी के पाप दबी जबान से कहे जाते थे.

मंत्रिमंडल की आपात बैठक कई बार बुलाई जा चुकी थी. सरकार का कहना था कि अली एक महत्वपूर्ण पक्षी विशेषज्ञ हैं, इसलिए उनकी सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी है और इसे हर स्तर पर सुनिश्चित किया जाएगा. सरकार जो कुछ प्रकट में बोलती थी, स्वगत में उससे ठीक उल्टा बोलती थी. उसके वाक्य या तो भविष्यकाल पर समाप्त होते थे या ‘चाहिए’ जैसी हिदायत पर. इसलिए अपराधी इस अंतराल में अपना काम करते रह सकते थे. ऐसी समझदारी सरकार और अपराधियों के बीच बिना कुछ तय हुए भी, तय हो चुकी थी. सरकार की इस घोषणा में भी एक चालाकी बिल्ली की तरह छिपकर बैठी. अली ने नए खतरे को सूंघ लिया था. उसका सारा काम ठप्प हो गया था. पहली बार उसे परिंदे में बदल जाने से उलझन हो रही थी. वो न तो एक परिंदे की तरह आजाद रह सकता था ना वापस मनुष्य बनना संभव था. इन दिनों उसे बार-बार फ़ज़्ल ताबिश का एक शेर याद रहा था, मैं हवा पानी परिंदा कुछ नहीं...

सारे जंगल शिकारियों से भर गए थे. अली छिपता फिर रहा था. चिड़ियों से नई जानकारियां इकट्ठी करने की उसकी इच्छा अंदर-ही-अंदर घुटकर दम तोड़ रही थी. उसने सोचा भी नहीं था कि इस तरह के उपद्रव भी हो सकते हैं. नौकरशाही और राजनीति का पूरा तंत्रा उसके लिए अनजाना था. परिंदों से बाहर की दुनिया कितनी जटिल और खूंखार हो चुकी है, इसकी कोई जानकारी उसे नहीं थी. अली को सबसे ज्यादा दुख इस बात का था कि उसके चक्कर में शिकारियों के हाथों बहुत सारी दुर्लभ चिड़ियां मारी जा रही थीं. कई बार उसे लगता कि उसे अपने को प्रकट कर देना चाहिए. दूसरे ही पल लेकिन मारे जाने का भय उसे दबोच लेता और वो फिर छिपने की नई जगहें तलाशने लगता. सारे परिंदों में अफरा-तफरी मची हुई थी. उनमें अपने को बचाने की कोई समझ नहीं थी. सहज बुद्धि से वे कभी-कभी खतरे को पहचान लेते थे. उनके लिए ये एकदम नई मुसीबत थी. चिड़ियों को समझ नहीं आ रहा था कि वो कहां जाएं, क्या करें. पहाड़ी मैना और तोते जो कभी-कभी मनुष्यों से सीखे वाक्य बोल लेते थे, अब एकदम चुप थे. सारे जंगल जो सुबह-शाम चहचहाटों से गूंजते रहते थे, अब बहुत सूने-सूने से हो गए थे.

अली को एक फायदा था कि वो अभी भी मनुष्यों की तरह बोल सकता था. शिकारियों का कोई दल जब उस पेड़ के लगभग पास पहुंच जाता, जिस पर अली बैठा होता, तो पत्तों के पीछे छिपकर अली मनुष्यों की आवाज में बोलता...अरे उधर...उधर...उस बड़े वाले सागोन के पीछे...उस शहतूत की तरफ...अरे बेवकूफ, इधर नहीं...उधर. करौंदे की झाड़ी की तरफ. शिकारियों के दल बहुत बड़े थे. वे अक्सर झुंड में घूमते थे इसलिए उन्हें लगता कि उन्हीं में से कोई बोला होगा और वे आगे निकल जाते. अली ने कई बार इसी तरह अपनी जान बचाई थी. धीरे-धीरे उसके लिए यह एक खेल भी हो गया था. कुछ खीज और गुस्से के कारण कई बार वो सिर्फ शिकारियों को छकाने के लिए यह हरकत करता. जब शिकारियों को चोट लगती या वो थककर लस्त-पस्त हो जाते और गालियां बकने लगते तो अली को बहुत मजा आता. अभी दो दिन पहले एक गोली उसके बिल्कुल बगल से निकल गई. अगर वो जरा-सा नहीं हटता तो काम हो जाता. वो कई दिनों से ठीक से सो नहीं पा रहा था. रात में भी बड़ी-बड़ी रोशनियां जंगल के अंधेरे को छेदती रहती थीं.

इन्हीं दिनों एक नया आंदोलन शुरू हो गया था. पर्यावरणवादी संगठनों ने पक्षियों के बड़ी संख्या में मारे जाने के खिलाफ धरने और रैलियां निकालना शुरू कर दिया था. इन संगठनों को अंतरराष्ट्रीय समर्थन मिला हुआ था. इसलिए रातों-रात सारे अखबारों और मीडिया में भी इन संगठनों की खबरें आनी शुरू हो गईं. विदेशी टी.वी. और अखबारों के प्रतिनिधियों ने जंगलों की ओर कूच करना शुरू कर दिया. सरकार के लिए यह एकदम नई आफत थी. पहले तो सरकार पर्यावरणवादियों के आरोपों का खंडन करती रही, फिर जांच के आश्वासन दिए जाने लगे. अंदर-ही-अंदर सरकार ने माफिया गिरोहों को चुप हो जाने की हिदायत भी दी. अली छिपते-छिपते और एक जंगल से दूसरे जंगल उड़ते-उड़ते तंग आ गया था. सनसनाती गोलियां, गुलेल से छूटे पत्थरों और तीरों से वो घबरा चुका था. एक दिन उसने तय किया कि अब वो जंगल से अपने घर चला जाएगा. और एक दिन अली ने जंगल से निकलकर अपने घर की ओर उड़ान भरी. बहुत सारी बंदूकें एक साथ गरजीं.बहुत सारी गुलेलों से पत्थर छूटे.

प्रिय पाठको!

कहानी में इसके बाद क्या हुआ यह किसी को भी ठीक-ठीक पता नहीं. जिस तरह अली के चिड़िया बनने पर, आज भी बहुत सारे लोग यकीन नहीं करते. हकीकत वैसी ही थी, जैसा मुहावरे में कहा जाता है, जितने मुंह उतनी बातें. बल्कि बातें मुंह से भी ज्यादा ही थीं. कुछ लोगों का कहना था...बकरे की मां कितने दिन खैर मनाती. एक छोटे से परिंदे की क्या मजाल कि इतने घाघ शिकारियों से बच पाता. मतलब यह कि कुछ लोग मानते थे कि अली उस दिन मारा गया और उस छोटे से परिंदे की लाश को कहीं फेंक दिया गया. लेकिन कहां फेंक दिया? कैसे फेंक दिया? सारे लोग क्या आंख मूंदकर खड़े थे? किसी ने कुछ भी न देखा हो, भला ऐसा कैसे हो सकता है? सौ तरह की बातें और हजार तरह के सवाल थे. कुछ लोगों का मानना था कि पर्यावरणवादियों के आंदोलन का दबाव और सरकारी घोषणाओं के चलते शिकारी उस दिन सड़कों पर नहीं आ पाए. इसी का फायदा लेकर अली सबको चकमा देकर अपने घर पहुंच गया था. फुसफुसाकर बोलने से क्योंकि बात की विश्वसनीयता बढ़ती थी इसलिए लोग जबान दबाकर कहते...अली की बीवी ने उसे कहीं छिपा दिया है. देखना एक दिन वो जंगल के सारे कारनामों का ऐसा भंडाफोड़ करेगा कि बड़े-बड़ों की पतलूनें गीली हो जाएंगी. कई लोग अलग-अलग बहानों से जब तब अली के घर में ताक-झांक भी करते रहते थे. कहा तो यहां तक जाता है कि सरकार ने भी पुलिस भेजकर अली के घर की बाकायदा तलाशी करवाई थी. बात बनाने में लोगों को महारत हासिल थी. वो किसी भी तिल का ताड़ और राई का पहाड़ बना सकते थे.

इन सबसे अलग एक समूह और था. उसके किस्सों और तर्कों का कोई तोड़ नहीं था. वे लोग सारी घटना का वर्णन इस तरह करते थे जैसे वे उसके चश्मदीद गवाह हों. वे कहते, अली को घर की तरफ उड़ते हुए गोली तो लगी थी. अरे जनाब हमने देखा, हमारी आंख के सामने अली को गोली लगी. खून की एक बूंद भी जमीन पर गिरी लेकिन इसके बाद, आप यकीन नहीं करेंगे, आप जिसकी कहो उसकी कसम खाकर कहता हूं कि साब. इसके बाद सचमुच चमत्कार हुआ. गोली पिघलकर. सुनहरी पानी की शक्ल में जमीन पर आ गिरी. और साहब पलक झपकते अली एक दूसरे ही परिंदे की शक्ल में बदल गया. कसम परवरदिगार की, उसने ऐसी उड़ान भरी कि आंख भी पीछा नहीं कर पाई.इस कहानी पर भी यकीन करने वाले शहर में कम लोग नहीं थे. उनसे कोई तर्क करता तो उनका एक ही जवाब होता. आदमी अगर परिंदा बन सकता है तो फिर कुछ भी हो सकता है. बहरहाल, कहते हैं कि शिकारियों के कई दल अभी भी जंगलों में घूम रहे हैं और अली को तलाश रहे हैं.

इसी बीच हमारे शहर के एक शायर ने उस परिंदे की मौत पर एक मर्सिया भी लिख लिया था. अली के बारे में लेकिन कुछ तय नहीं हो पा रहा था. इसलिए मर्सिया जिसे अंजाम भोपाली ने अंजाम दिया था आज भी उनकी जेब में रखा रहता है. पता नहीं कब खबर आ जाए और कब उसे पढ़ना पड़े.

 

’मैं हवा पानी परिंदा कुछ नहीं

  ये नदी जाने कहां तक जाएगी

- फ़ज़्ल ताबिश

 

(‘हंस’, फरवरी 1999)

 

 

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rajesh joshi , राजेश जोशी , हिंदी साहित्य

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